बाटला हाउस की छत पर फैले इतने सारे गिद्द
देखरहा हूं इतने सारे गिद्दों को
पंख फैलाते हुये
झपटते है, मुर्दों के ऊपर
संवेदना विहीन
आरुषी मरी थी
उड़ गये थे ये गिद्धाड़े
फैलाये नेजे समान पंजो को
नोंच नोंच कर खाते रहे थे
उस बच्ची के शव को
अपनी टीआरपी के लिये
करते रहे थे पार्टियां
मनाते रहे थे मौत के जश्न
फ़टे थे बम्ब, मरे थे निर्दोष
उड़ पड़े थे गिद्द
खाने के लिये उन शवों को
पुलिस नपुंसक है, चीखते हुये
उछालते सवालों पर सवाल
क्यों नहीं कुछ करती आंतरिक व्यवस्था?
लहराते माइक को, नेजे की तरह
अब भी ये गिद्द अपने नेजे फैलाये उड़ रहे हैं
नोंच रहे हैं इंस्पेक्टर शर्मा के शव को
उछालते सवालों पर सवाल
देख रहा हूं इनके खून से सने हुये मुंह
बाद में मनायेंगे ये टीआरपी की पार्टिया
मौत के जश्न
पहले जब गिद्द शवों को नोंच कर खाते थे
तब मैं परेशान होता था
सोचता था कि ये आदमी शवों को क्यों नोंच रहे हैं
लेकिन अब एकदम निर्विकार हूं
क्योंकि मुझे मालूम है
ये तो गिद्द है
इनका तो काम ही है
शवों को नोंचना
Thursday, September 25, 2008
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